न होती मज़हबी दूरियाँ, न होती ऊंच नींच की मजबूरियां
आदम दिल यूँ शख्त न होता, जो ये तख़्त न होता
तो जान पाते की सबकी रगों में खून एक रंग है, सियासत की वजह से ही आपस में जंग है
लोगो ने बहाया यूँ रक्त न होता, जो ये तख़्त न होता
साम दाम दंड भेद जिसके लिए, जात पात रंग भेद जिसके लिए
सत्ता के लिए आदमी इतना आसक्त न होता, जो ये तख्त न होता

जला दो ऐसे तख़्त को, जो रक्त में भेद करता है
हटा दो ऐसे तख़्त को, हर शख्स में भेद करता है
मिटा दो ऐसे तख़्त को, जिस थाली में खाया उसी में छेद करता है
आओ आगाज़ करें एक नए रिवाज़ का
समर्थन करें जनता की हर आवाज़ का
न हो कोई तख़्त, न ही हो कोई औहदा
जमीं से जुड़ें ऐसे जैसे जुड़ता है कोई पौधा

आओ एक सभ्य समाज, नयी व्यवस्था, नए हिन्दुस्तां का सपना बुने
जमीन से जुड़े, मिटटी और आदमी की कद्र करने वालों को अपना नेता चुने
ताकि हम तो कहें दुनिया भी कहे हमसे सारे जहाँ से अच्छा हुन्दुस्तान तुम्हारा

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